प्रकृति की कविता

जहाँ शब्द भी सांस लेते हैं

सुबह की पहली हवा
जब चेहरे को छू जाती है,
तब एहसास होता है —
ज़िंदगी अभी बाकी है।

पेड़ों की खामोशी में
बहुत कुछ कहा जाता है,
जो सुन ले ध्यान से
वही सच में जी पाता है।

नदियाँ रुकती नहीं हैं,
फिर भी सबको राह देती हैं,
शायद यही वजह है
कि वो हमें बहुत कुछ सिखाती हैं।

अगर थक जाओ कभी,
तो आ जाना मेरी गोद में,
प्रकृति कभी सवाल नहीं पूछती,
बस अपनापन दे जाती है।